شهادت حضرت اباالفضل (ع)

 

افراشت به کوی عشق، پرچم، عباس

در عشق، فشرده پایِ محکم، عباس

بی آب، از او گلشنِ دین شد سیراب

بی دست، گرفت دستِ عالَم، عباس

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عباس! دلی که پایْ بستِ تو بُوَد

مشتاقِ لقای حق پرستِ تو بُوَد

امروز، چه کرده ای که فردا، زهرا

اسبابِ شفاعتش، دو دستِ تو بُوَد؟

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دستی که بر آن دست خدا زد بوسه

صد حیف که شمشیر جفا زد بوسه

در کرب وبلا، حسین از روی زمین

برداشت و با قدِ دوتا زد بوسه

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زان دست که چون پرنده، بی تاب افتاد

بر سطحِ کرختِ آب ها تاب افتاد

دستِ تو چو رود، تا ابد جاری شد

زان روی که در حمایت از آب افتاد

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آن روز، غریبانه و تنها جان داد

پرورده آسمان، به صحرا جان داد!

اسرارِ شگفتِ عشق، معنا می شد

وقتی که عطش، کنارِ دریا جان داد

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هنگامِ سفر، پیشْ قدم شد دستم

قربانیِ قامتِ عَلَم شد دستم

تا نامه عشق را به خون بنگارم

در محضرِ وصلِ او، قلم شد دستم

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هرچند که مضمونِ غریبت تنهاست

نامِ تو سرودِ موجْ موجِ دریاست

بالی ز علی است با تو، بالی ز حسین

پروازِ تو از غدیر تا عاشوراست

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آب و عطش، آن اراده را نرم نکرد

جز یادِ خدا، دلِ تو را گرم نکرد

دستی که نشست در کمینِ دستت

الله الله، از خدا شرم نکرد

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در هیبتِ تو، سطوتِ حیدر دیدند

در خشمِ تو، التهابِ آذر دیدند

آن دم که حسین را برادر خواندی

در جاریِ تو، زلالِ کوثر دیدند

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خورشید، میان آب دریا می رفت

مهتاب، به شامِ سبزِ رؤیا می رفت

در پیچکِ گُلرنگ، تنِ زخمیِ عشق

بر دوشِ ستاره، رو به بالا می رفت

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با زحمت بسیار، لبش را جنباند

با حنجرِ پاره اش برادر را خواند

خورشید به بالای سرش آمد و او

آغوش گشود و در همان حالت ماند

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شتاقم و غیر من کسی ساقی نیست

در هیچ دلی، این همه مشتاقی نیست

در سینه ام، آرزوی سقایی هست

افسوس که دست در تنم باقی نیست

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در خیمه، کسی خدا خدا می خوانَد

یک کودکِ تشنه لب، دعا می خوانَد

ای دست! چرا چرا به خاک افتادی؟

یک قافله تشنگی، تو را می خوانَد

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ناگفته بسی مانده سخن ها، عباس!

افتاده عَلَم به روی شن ها، عباس!

در خاک، بکار دست ها را ای مرد!

برخیز که عشق مانده تنها، عباس!

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در رودِ زمانه، پیچ و تاب افتاده است

خورشید، به خوف و اضطراب افتاده است

ظهر است و در آیینه چشمانِ فرات

تصویرِ بلندِ آفتاب افتاده است

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بسیار گریست تا که بی تاب شد آب

خون ریخت ز دیدگان و خوناب شد آب

از شدتِ تشنه کامی ات ای سقا!

آن روز، ز شرمِ روی تو، آب شد آب

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تکبیر تو چون به گوش مرداب افتاد

صد رعشه ز خوف، بر دل خواب افتاد

وقتی که قدم به شط نهادی ای مرد!

از ترسِ تو لرزه بر تنِ آب افتاد

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آن نخل به خون تپیده را می بوسید

آن مشکِ ز هم دریده را می بوسید

خورشید، کنارِ علقمه خم شده بود

دستانِ ز تن بُریده را می بوسید

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توفان شد و شاخه گُلِ یاس شکست

در دیده مرد، اشکِ الماس شکست

بر سینه مشک، تیرِ جان سوزی خورد

یک علقمه، آیینه احساس شکست

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جنگاورِ حق پرست، بر خاک افتاد

سرمستِ مِیِ «الست»، بر خاک افتاد

بر تشنه لبانِ خیمه ها ناله برید

عباس، بدون دست، بر خاک افتاد

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ای سروِ من! آن قدِ رسایت چه شده است؟

آن باغِ نگاهِ دلربایت چه شده است؟

در دست تو بود، آب اگر آبی بود

سقای من، آه، دست هایت چه شده است؟

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آن روز که نبض شط، مشوش می زد

آن روز که آسمان صدایش می زد

سقای کبوترانِ لب تشنه عشق

هم دوشِ عطش، به آب و آتش می زد

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او آمد و امواج تب و تاب آورد

با تشنگی اش، حماسه ای ناب آورد

او آمد و با آمدنی دیگرگون

یک دجله دریغ، بر لبِ آب آورد

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طفلانِ حرم، تو را توان می دادند

یعنی: به قدم های تو جان می دادند

می آمدی و فرشتگان بر لب رود

اعجاز تو را به هم نشان می دادند

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آن لحظه که مِیْ پرست از دست نداد

نازی است که چشمِ مست از دست نداد

تا دست نداد دامنِ عشقِ شریف

سقای شهید، دست از دست نداد

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هر چند چراغِ ماه، سوسو بزند

با عشق، کدام صخره، پهلو بزند؟

برخاست، صلا به تشنگان داد و فرات

برخاست که بوسه بر لب او بزند

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آغشته به خون، سپیده دم شد ای وای

یک لاله، ز باغِ عشق، کم شد ای وای

بر مصحفِ خون، رسولِ تاریخ نوشت

اسطوره والقلم، قلم شد ای وای

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بر تشنه لبان، دجله بی تاب، گریست

چون چشمِ فرات، مشک پُر آب، گریست

در دامن کهکشانیِ دشتِ عطش

خورشید، کنارِ نعشِ مهتاب، گریست

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آن شیر که فرمانده لشکر گردید

سقای گلِ سرخِ پیمبر گردید

تفتیده جگر، برون شد از شط فرات

در دجله خونِ خود شناور گردید

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از ساغرِ ماه، باده نوشید و گذشت

بر تن، زره از ستاره پوشید و گذشت

بی دست، کنارِ شط خونین فرات

خورشیدصفت، به شب خروشید و گذشت

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یک باره چو مِهر، شعله ور گشت عباس

سوزنده تر از خشمِ شرر گشت عباس

ا یادِ لبِ خشکِ جگر گوشه عشق

از شط فرات، تشنه برگشت عباس

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تا جنگلی از تیغ، بر او راه گرفت

بارانِ هر آنچه زخم، ناگاه گرفت

خورشید! بر او نماز آیات بخوان

در علقمه، از خون، رخِ آن ماه گرفت

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در محضرِ آفتاب، جان می دادی

در آتشِ التهاب، جان می دادی

آن روز، به دشتِ کربلا، ای عباس!

لب تشنه، کنارِ آب، جان می دادی

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پیراهنی از زخم، به تن دوخته است

این رسم، ز حضرتِ غم آموخته است

ای سروِ تماشاییِ ایمان، عباس!

دل، شعله به شعله، در غمت سوخته است

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مردی که به جست وجوی دریا می رفت

با شِکوه به گفت وگوی دریا می رفت

هنگامِ نزولِ اشک از دیده مشک

دیدند که آبروی دریا می رفت

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بر دامنِ او گردِ مدارا ننشست

سقا، نَفَسی ز کارِ خود وا ننشست

هر چند قلم شد عَلَمِ بازوی او

با دستِ بریده، باز از پا ننشست

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تا ماه، اسیر پنجه غم شده بود

خورشید، سیاه پوشِ ماتم شده بود

توفان زده کشتیِ نجاتِ امت

بشکسته کنارِ نَهرِ علقم شده بود

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بر کند دل از جهان و تقدیم تو کرد

خون ریخت ز دیدگان و تقدیمِ تو کرد

ون تیر، به مشک خورد و رفت آب ز دست

بر دست نهاد جان و تقدیمِ تو کرد

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ای ساقی سرمست ز پا افتاده!

دنبالِ لبت، آبِ بقا افتاده

دست و علم و مشک، سه حرفِ عشق است

افسوس، ز هم، این سه جدا افتاده!

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او غربتِ آفتاب را حس می کرد

در حادثه، التهاب را حس می کرد

بی تابیِ کودکانش آتش می زد

وقتی خُنکای آب را حس می کرد