امام حسین علیه السلام

 

تنها نه من، که بر لب جبریل نوحه‌هاست

گویا عزای شاه شهیدان کربلاست

حزین لاهیجی

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آن خضر اهل بیت به صحرای کربلا

نوشید آب تیغ، ز بس تشنه‌کام بود

حزین لاهیجی

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تفتند، ز آتش عطش آن لعل ناب را

سنگین‌دلان مضایقه کردند آب را

حزین لاهیجی

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هفتاد و دو سینه سرخ هجرت کردند

با سَروَرِ آفتاب بیعت کردند

رفتند و به دریای ابد پیوستند

چون رود، به اصلِ خویش رجعت کردند

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لب های وی از داغ حکایت می کرد؟

یا از عطشِ آب، روایت می کرد؟

گویی که به عرشِ نیزه، از سوره عشق

هفتاد و دو آیه را تلاوت می کرد

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لب تشنه، به صحنِ آب کردند طواف

شوریده و با شتاب کردند طواف

بر نیزه، به گردِ خیمه خونِ خدا

هفتاد و دو آفتاب کردند طواف

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شب، خونِ دلِ غروب را می نوشید

خورشید، به جنگِ شب، زره می پوشید

از خونِ شهیدانِ حسینی آن روز

هفتاد و دو چشمه، بر زمین می جوشید

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خورشید بر این تیره مغاک افتاده است؟

یا بر سَرِ نی، آن سَرِ پاک افتاده است؟

بر عرشِ نی، از تلاوتِ او پیداست

هفتاد و دو سوره، روی خاک افتاده است

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این سوگ که زخم را شکوفا کرده است

سوگی است که پُشتِ کوه را تا کرده است

چندی است زمین و آسمان خون رنگ است

یعنی که: جهان، تعزیه برپا کرده است

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گُلگونه آفتاب، در هم از چیست؟

پشتِ فلک و قامتِ مَه، خَم از چیست؟

گر نیست عزای عشق برپا، ای عقل

پُر شور، چو روزِ حَشر، عالَم از چیست؟

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ای چشم، ببار، باغِ آهم گُل کرد

جان، شعله کشید، داغِ آهم گُل کرد

پروانه واژه ها به پرواز آیید!

در خلوتِ غم، چراغِ آهم گُل کرد

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در کوچه دل، صدای پا می شنوم

آوازِ نگارِ آشنا می شنوم

این طُرفه صدایی که مرا می خوانَد

از نای شهیدِ کربلا می شنوم

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او بود و دو چشمِ اشکباری که مپرس

در بُهت و سکوت، شامِ تاری که مپرس

می رفت و صدای شیونِ مادرِ او

می گشت بلند از مزاری که مپرس

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امسال بنفشه را سیه پوش کنید

گُل خنده عیش را فراموش کنید

در شامِ غریبانِ حسین بن علی

هر جا که بُوَد چراغ، خاموش کنید

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آمد به کنارِ قتل گاه و پرسید:

آیا تو برادرِ منی ای خورشید؟

من در عَجَبم چگونه طاقت آورد

آن لحظه که رگ های تو را می بوسید

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تا خیمه به خون زنند در یاری عشق

دادند صلای سرخِ بیداری عشق

در کرب وبلای عاشقان پرپر شد

هفتاد و دو لاله در هواداری عشق

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چون کرد نظر به قتل گاه، آن شب، ماه

تا صبح کشید از دل آه، آن شب، ماه

هفتاد و دو خورشیدِ به خون غلتان را

حیرت زده می کرد نگاه، آن شب، ماه

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آن شب که فروغِ مَه بر افلاک دمید

با حالتی آشفته و غمناک دمید

هفتاد و دو قرصِ ماه در آن دلِ شب

چون پنجه آفتاب، از خاک دمید!

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در محفلِ عاشقانِ فرزانه و مَست

می گشت سبوی کربلا دست به دست

ناگاه ز خیلِ ناکسان، دستی پَست

هفتاد و دو پیمانه به یک سنگ شکست

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گُل پرورِ گُل سرشت در دشتِ عطش

هفتاد و دو لاله کشت در دشتِ عطش

آن گاه به نامِ عشق، بر هر برگی

خون نامه دل نوشت در دشتِ عطش

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الحق که به ما درسِ وفا داد حسین

هر چیز که داشت بی ریا داد حسین

یعنی که تأملی کنید ای یاران!

آن هستیِ خود ز کف چرا داد حسین؟

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ما حلقه به گوشِ عشقِ روح افزاییم

سرمست ز شورِ جامِ عاشوراییم

گشتیم چو قطره، محو در عشقِ حسین

اکنون به طفیلِ عشقِ او دریاییم

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وقتی که شکسته دل، دعا می کردی

سجاده سبزِ شُکر، وا می کردی

حتی دلِ سنگ هم به داغِ تو گریست!

آن دَم که خدا، خدا، خدا می کردی

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آن روز، ز دشتِ کربلا خون بارید

از ابرِ سیاهِ نینوا خون بارید

آن لحظه که شد شهید، فرزندِ رسول

از زخمِ دل ستاره ها خون بارید

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از بهرِ ستیز و مرگ، آماده شوید

در محضرِ عشق دوست، افتاده شوید

از خونِ حسین بشنوید این پیغام

در طولِ زمان، همیشه آزاده شوید

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تیغ از رُخِ او ز ترس، گریان گردید

مرگ از نگهش، به خویش، لرزان گردید

آوخ، چه سیه کاری و ننگی ابدی

از مرگِ حسین، سهمِ انسان گردید

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مرگِ تو، تمسخرِ ستم کاری بود

رزمِ تو، نهایتِ فداکاری بود

خورشیدِ زمانه بوده ای در همه عمر

مِهرِ تو میانِ عاشقان جاری بود

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از خونِ تو شمشیر، وضو بگرفته است

مرگ از تو هزار آبرو بگرفته است

زان باده خونین که تو بر لب زده ای

آتش به دلِ جام و سبو بگرفته است

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خونِ من و هر دو دیده، خویشاوندیم

در ریختنِ اشک، سخاوتمندیم

در راهِ تو یاحسین ما از دل و جان

احرامِ شهادت و بلا می بندیم

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مَه، بارقه ای است در شبستان حسین

شب، حادثه ای ز دردِ پنهانِ حسین

هر صبح، ز دامنِ افق، خون آلود

خورشید، برآید از گریبانِ حسین

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گر سر ندهد حسین، با سَر چه کند؟

با خرمنِ لاله های پر پر چه کند؟

گیرم که به خیمه، مشکِ آبی هم بود

با دست بریده برادر چه کند؟

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او روزِ شهود خویش را می دانست

گودالِ فرودِ خویش را می دانست

چون شاعرِ چیره ای از آغازِ سخن

پایانِ سرودِ خویش را می دانست

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چون دردِ تو دید، غم به فریاد آمد

وز ماتمِ تو، الم به فریاد آمد

زهرا به وداعِ تو چنان زار گریست

کز حالت او، حرم به فریاد آمد

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باید دلِ خود به عشق پیوند زدن

دم از تو ـ تو ای خونِ خداوند ـ زدن

از تو، ره و رسمِ عشق باید آموخت

وز اصغرِ تو، به مرگ لبخند زدن

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با کعبه، وداع آخرین بود و حسین

چون اهلِ حرم، کعبه، غمین بود و حسین

بشکوه ترین لحظه، تداعی می شد

تکبیرِ نمازِ واپسین بود و حسین

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می آمد و جسمِ بی کفن، خون آلود

از زخمِ شَرَر، تمام تن، خون آلود

تنها نه دلِ شقایق از داغش خون

سرتاسرِ باغِ نسترن، خون آلود

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با خیلِ ستاره، فوج در فوج، بمیر

طغیان کن و با ترنمِ موج، بمیر

این است به روی نیزه، پیغامِ حسین

همواره پرنده باش و در اوج، بمیر

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شمعی است که سوز و ساز را ترک نکرد

راهِ خطرِ حجاز را ترک نکرد

این عشق، چه عشقی است که در جنگ، حسین

سَر داد، ولی نماز را ترک نکرد

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می رفت و به راه، چشم می دوخت فرات

آن روز که چون ستاره، افروخت فرات

ای کاش، حسین هم لبی تر می کرد

در آتشِ این عطش چه می سوخت فرات

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می رفتی و ابرِ دیده، بارانیِ تو

بر نیزه، سَرِ شریف و نورانیِ تو

گُل های هزار واژه خَم می گشتند

در مَعبر آفتابِ قرآنیِ تو