روز طبيعت

 

طبیعت، پلکی از خوش رنگیِ آیینه ماست! همان آیینه ای که انعکاسِ زندگی هاست!

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بیایید به شکرانه زندگی و به خاطر تماشا، طبیعت را دوست داشته باشیم؛ به پرواز آبی پرنده ها، به طنازی

شکوفه های گیلاس، به رقص پروانه ها، به شادابی گل ها و به آرامش ماهی ها احترام بگذاریم.

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ای کاش همه ما با طبیعت دوست بودیم؛ آن قدر صمیمی که می توانستیم

بدونِ کارت دعوت، در جشن طبیعت شرکت کنیم.

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ای کاش همه ما با طبیعت مهربان بودیم!

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طبیعت، هم خون من و توست. تو از شانه های سبز او برخاسته ای. باید شکرگزار لحظه هایی بود که در جوار

نفس های او، از صلح و آرامش سرشار می شویم و همه زمختی های روزمره را تاب می آوریم.

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غنچه های رنگارنگ بهار، سلام های خداوندند که روی لبخندهای زمین، باز می شوند.

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هر شکوفه، جلوه معطر طبیعت است.

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بهار، زیباترین کلام عاشقانه خداوند است.

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به دریا بنگرم دریا ته بینم

به صحرا بنگرم صحرا ته بینم

به هر جا بنگرم، کوه و در و دشت

نشان از قامت رعنا ته بینم

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شکفته باش جهان را شکفته گر خواهی

که بر گشاده‌دلان چرخ روی خندان است

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سلام من به آن گلی که صبح‌دم به بوسه نسیم و دست پرحرارت هوا در آرزوی زیستن، به خنده باز می‌شود.

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باید برویم تا عطر زندگی را، تپش هستی را از نزدیک بشنویم و در عرصه

با اهمیتی از سبز، بار دیگر متولد شویم؛ چونان درختان.

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پایین صفحه سیزدهم تقویم باید بنویسند که: «چشم ها را باید شست، جور دیگر باید دید».

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تقویم که به صفحه سیزدهم می رسد، می شکفد و با پرهیز از خرافات، خوش بینانه به

قضیه بهار و طبیعت نگاه می کند؛ همه روزها، خوش وقت هستند.

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اندیشه ما بیمار خواهد شد، اگر روزی را «نحس» بدانیم!

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امروز اما دهان «سیزدهم»، پر است از خیرمقدم گویی به مادر دشت و دامنه ها. امروز، بهار، جریانی از گل به راه انداخته است. می خواهد خون ما را سبز و تازه کند برای بودن. در خور تأمل است.

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مقابل نگاه سرسبز بهار، مباد حرف از چیدن و پرپر شدن بزنیم؛ واقعاً دل بهار نازک است!

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به طبیعت، سلام می کنم. به خاک، به آغاز و پایان وجودم سلام می کنم!

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درختان سبز در نظر هوشیار

هر ورقش دفتری ست معرفت کردگار